Thursday, 22 December 2011

लह लह ईंट बनानेवाले

लह लह ईंट बनानेवाले
भट्ठी को सुलगाने वाले
खडी धूप के नीचे अक्सर
सूखे चने चबाने वाले
दिखते हैं कमज़ोर
मगर तुम
जोर से इनसे मत भिड़ना
........................
ये धूप जले काले चेहरे
बेख़ौफ़ हँसी वाले चेहरे
पलकों पे धूल जमी इनकी
बाजू में खून दौड़ता है
ये पतले दुबले सींक बदन
इस्पात से ज्यादा असली हैं
ये चुप्पी साधे बिन बोले
हर बात से ज्यादा असली हैं
लो
खौल रहा है दौर
के चाहे
खूब मचा लो शोर
मगर तुम
जोर से इनसे मत भिड़ना
ये सड़कों के सब कोलतार
जो हाथ गलाते रहते हैं
ये आग के ऊपर रोजाना ही
आते जाते रहते हैं
ये बेसब्री और सब्र के नीचे
कुछ बतियाते रहते हैं
ये ..........
सोलह घंटों में
जुटा रहे हैं
रोटी के दो कौर
के आखिर
कब तक रात रहेगी बोलो
देंगे सब झकझोर
कभी तुम
जोर से इनसे मत भिड़ना
बस दिखते हैं कमज़ोर
मगर तुम
जोर से इनसे मत भिड़ना

जो बदन गला कर मिटटी से
इस्पात बनाने वाले हैं
जो सड़कों पर चौबिस घंटे
गाड़ी दौड़ाने वाले हैं
जो 60 साल तक गेट-पास से
आने जाने वाले हैं
उनके हाथों में चाभी है
दुनिया के हर ताले की
और
चाभी ना हो तो भी वो
तालों को तोड़ के आयेंगे

वो
पत्थर तोड़ने वाले देखो
लौट रहे हैं इस जानिब
वो दरिया मोड़ने वाले देखो
लौट रहे हैं ईस जानिब
इस जानिब काफी गर्मी है
खौल रहा है अफ़साना
किरदार बदलने होंगे अब
हथियार बदलने होंगे अब
भीतर बदला बाहर बदला
और बदला चारों ओर
के अब तुम
जोर से इनसे मत भिड़ना....
बस दिखते हैं कमज़ोर .....
कभी तुम
जोर से इनसे मत भिड़ना
जो
ऊंचे ऊंचे महल अटारी
अपने सर पे ढ़ोते हैं
अक्सर संजीदा होते हैं
और बीडी पीते रहते हैं.......
..............................
मरते हैं हर रोज़ मगर ये
फिर भी जीते रहते हैं
ये चुप रहते हैं अक्सर लेकिन
जब लड़ने पे आते हैं
चाहे जितना रोको
आपे से
बाहर हो जाते हैं
ऐसे में क्या होता है
इतिहास बताएगा पढ़ लो

इतिहास बनाए जाते हैं
और ख़ास बनाए जाते हैं
लेकिन इससे पहले शायद
खुद जलना पड़ता होगा
इतनी दूर पहुँचने में
काफी चलना पड़ता होगा
आओ
चलते हैं हम भी
दिल्ली के आला महफ़िल में
जहां
शीश नवाए जाते हैं
झंडे फ़हराए जाते हैं
और राष्ट्रगान के कोरस पे
जहां बैंड बजाये जाते हैं
जहां तोप तमंचे ताकत के
झूठे अफ़साने चलते हैं
और हरेक प्रांत के छोटे मोटे
गाने वाने चलते हैं
जहां नौटंकी अपनी पूरी
श्रद्धा से खेली जाती है
जहां भाषण झाडे जाते हैं
जहां झांट उखाड़े जाते हैं
जहां तमगे बांटे जाते हैं
और तलुवे चाटे जाते हैं
आओ
बीडी पीने वालों
आओ
के दिल्ली चलते हैं
तुम ईंट सजाने मत आना
तुम ईंट गिराने आ जाना
तुम आग बुझाने मत आना
तुम आग लगाने आ जाना
सच झूठ बताने आ जाना
दिल्ली खौलाने आ जाना
आओ
बीडी पीने वालों
आओ अबके माचिस ले के
तुम रास रचाने आ जाना
मुट्ठी खुलवाने आ जाना
मुक्के टकराने आ जाना
उलझन सुलझाने आ जाना
गद्दी को हिलाने आ जाना
हर चीज़ बचाने आ जाना
बीडी पीने वालों आना
दिल्ली खौलाने आ जाना



तीसरा खंड समाप्त

5 comments:

vibha rani Shrivastava said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 15 जुलाई 2017 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!


Vishwa Mohan said...

गज़ब!

Pammi said...

बहुत बढिया

Sudha Devrani said...

बहुत सुन्दर....
वाह!!!

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर।